सावन के महीने में भोलेनाथ के इन श्लोको को जरूर सुनें

शिव ध्यान मंत्र । श्री शिव ध्यानम् । Shiva Dhyan Mantra

🌿 श्रावण मास और शिव ध्यान का महत्व:

श्रावण (सावन) का महीना भगवान शिव को समर्पित है। यह वर्ष का वह पावन समय होता है जब भक्त शिव का ध्यान, व्रत, और अभिषेक करते हैं। कहते हैं, इस मास में भगवान शिव की आराधना का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। यह माह शिव भक्ति में लीन होकर आत्मा की शुद्धि और ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर होने का समय होता है।

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं

रत्नाकल्पोज्ज्चलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।

पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं

विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥

 

ॐ डिं डिं डिंकत डिम्ब डिम्ब डमरु, पाणौ सदा यस्य वै। 

फुं फुं फुंकत सर्पजाल हृदयं , घं घं च घण्टा रवम् ॥ 

वं वं वंकत वम्ब वम्ब वहनं , कारुण्य पुण्यात् परम् ॥ 

भं भं भंकत भम्ब भम्ब नयनं , ध्यायेत् शिवम् शंकरम्॥

 

यावत् तोय धरा धरा धर धरा ,धारा धरा भूधरा॥ 

यावत् चारु सुचारु चारू चमरं , चामीकरं चामरं ॥ 

यावत् रावण राम राम रमणं , रामायणे श्रुयताम्॥

तावत् भोग विभोग भोगमतुलम् यो गायते नित्यस:॥ 

 

यस्याग्रे द्राट द्राट द्रुट द्रुट ममलं , टंट टंट टंटटम् ॥ 

तैलं तैलं तु तैलं खुखु खुखु खुखुमं , खंख खंख सखंखम्॥

डंस डंस डुडंस डुहि चकितं , भूपकं भूय नालम् ॥ 

ध्यायस्ते विप्रगाहे सवसति सवलः पातु वः चंद्रचूडः॥ 

गात्रं भस्मसितं सितं च हसितं हस्ते कपालं सितम् ॥ 

खट्वांग च सितं सितश्च भृषभः , कर्णेसिते कुण्डले । 

गंगाफनेसिता  जटापशु पतेश्चनद्रः सितो मूर्धनि । 

सोऽयं सर्वसितो ददातु विभवं , पापक्षयं सर्वदा ॥

 

ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणम् ।

वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनां पतिम् ॥

वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं वन्दे मुकुन्दप्रियम् ।

वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवंशंकरम् ॥

 

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम् ।

सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥

शांताकारं शिखर शयनं नीलकंठ सुरेशं

विश्वाधांर स्फटिक सहृशं शुभ्रवर्ण शुभागमं

गौरी कान्तं त्रितनयनं योगी मिर्ध्या नगम्यं

वंदे शंभु भवभयहरं सर्व सर्वलोकैकनाथम् ॥

करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा ।श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधं ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व ।
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥

 

 

🔱 भगवान शिव का संक्षिप्त परिचय:

भगवान शिव — आदि योगी, संहारक, करुणा के सागर, और शून्य के स्वामी। वे न तो शुरू हैं, न अंत। उनका स्वरूप है सदा शांत, फिर भी भीतर छुपा है अपार तांडव। वे एक ही समय पर गृहस्थ हैं और सन्यासी भी, भोग और योग का अद्भुत संगम।

उनकी आंखें बंद हों तो ध्यान; खुली हों तो कृपा।


🌌 शिव की शक्ति – वास्तविकता और भावनाओं के साथ:

  1. ध्यान की शक्ति:
    शिव की सबसे गूढ़ शक्ति है मौन ध्यान। वे योग में स्थित हैं, पर हर जीव की हलचल को जानते हैं। उनका ध्यान व्यक्ति को आत्म-चेतना तक ले जाता है।

  2. तांडव – विनाश की नहीं, परिवर्तन की शक्ति:
    जब शिव तांडव करते हैं, तो वह केवल नाश नहीं, नव निर्माण का संदेश होता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन ही शाश्वत है।

  3. नीलकंठ – विष पीकर भी शांत:
    उन्होंने समुद्र मंथन का विष पीकर संसार को बचाया। यह दर्शाता है – त्याग, संयम, और कर्तव्य की चरम पराकाष्ठा।

  4. भस्म और शव पर बसे शिव:
    वे भस्म लगाते हैं, श्मशान में रहते हैं – ये हमें सिखाता है कि मृत्यु भी जीवन का हिस्सा है, और अहंकार का अंत निश्चित है।

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